ये गूंगे पेड़पौधे
चाहते हैं तुम्हारा स्पर्श
रास नहीं आती है इन्हें
नए हाथों से परवरिश
देखते हैं उदास आखों से
ज्यों ढूँढती हो गाय
अपने प्रिय ग्वाले को
पत्ते पत्ते से झरती उदासी
चाहती है जानना
तुम्हारे न होने का सबब
कह दो ये भी देखें तुम्हें
दसों दिशाओं में, जैसे मैं
तुम्हारी सिरजी बेलें
बरजती हैं पास आने से
हो सके तो समझा दो उन्हें
तुम्हारा अक्स ढूंढें मुझमें
क्योंकि अब तुम बाहर नहीं
मेरे भीतर हो
मेरे हाथों में ताक़त तुम्हारी
मेरी गति में शक्ति तुम्हारी
मेरे जीवन में संकल्प
तुमसे है
मैं तुमसे एकमेक हूँ
जैसे बांसुरी और राग
जैसे चाँदनी और उजास
जैसे बादल और बिजली
जैसे जल और मछली
जैसे पानी और प्यास
जैसे राधा और रास
जैसे जीवन और सांस