Monday, 13 October 2008

तुम्हारे लिए


प्रेम का यह दीप मैं बुझने न दूँगी
मैं तुम्हारी याद में तिल-तिल जलूँगी

तुम सितारा बन गए हो मैं धरा की धूल हूँ
हो गए तुम पार प्रियतम मैं अभी इस कूल हूँ
मिलन का क्षण जोहती साँसे गिनूंगी

अब न बांधूंगी तुम्हें तुम मुक्त विचरो

स्वर्ग से पाताल तक चाहे जहाँ ठहरो
रुख इधर करना कभी
तो राह तकती मैं मिलूंगी

ज़िन्दगी है एक सपने की कहानी
पलक पर ठहरा हुआ दो बूँद पानी
सँग तुम्हारे मृत्यु में
कल्पान्त तक विचरण करूंगी

चाँदनी निष्प्रभ कभी इतनी न थी
रात वीरानी घनी इतनी न थी
कर गए सबको अकिंचन
मैं भला क्यों दोष दूँगी

चाहतों के अनगिनत पल
आंसुओं में हैं बरसते
प्रीति के उच्छ्वास निशि-दिन
साँस में हैं आह भरते

अब न जीवनधन तुम्हें
इसके सिवा कुच्छ और दूँगी
मैं तुम्हारी याद में तिल-तिल जलूँगी

Saturday, 4 October 2008

मेला

माँ का थामे हाथ बच्चा मेले में जो आया
सबसे पहले देख पकौड़ी मन उसका ललचाया
खींचा माँ ने हाथ अभी तो मेले में आए हो
देखो पहले क्या - क्या मेले में है अकुलाये हो
कूद कूद कर बच्चा चलता पकड़े माँ का हाथ
छोड़ देना हाथ नहीं तो खो जाएगा साथ
देख गुब्बारे बच्चा लपका माँ यह गुब्बारे ले दो
बचा सकोगे तुम इसको इसकी गारंटी दे दो
बच्चा सकुचाया अम्मा है भीड़ यहाँ पर भारी
अच्छा छोड़ो ले देना तुम जब आऊंगा अगली बारी
देखी उसने एक जगह पर फिरकी प्यारी प्यारी
अम्मा तुम यह फिरकी ले दो, है यह कितनी प्यारी
तभी देख झूले में बैठे रंग - बिरंगी पोशाकों में
सजे सजाये सुकुमारों को प्यारे प्यारे परिधानों में
अम्मा फिरकी फ़िर ले लेंगे जब आयेंगे अगली बारी
झूले में बैठा दो बोला बोलों में भर कर लाचारी
चलो घूम लेते हैं मेला फ़िर सोचेंगे क्या करना है
क्या क्या मेले में है पहले यह भी तो मालूम करना है
देख एकतारा बच्चे का मन लट्टू हो आया
बजा रहा था धुन कोई बूढ़ा मोहक मनभाया
बोला बच्चा माँ से माँ मुझको बस यह बजा दे दो
और नहीं कुछ मांगूंगा इसका वादा मुझ से ले लो
घूम चुके हैं अब तो काफी माँ के मन में आई
बोलो कितने में दे दोगे यह एकतारा भाई
बहन आठ आने दे दो यह बालक खुश हो जाएगा
बस दो चार बचे हैं फ़िर तो जाने कब आएगा
एक रुपैया गाँठ में बांधे माँ की चिंता भारी
कैसे समझाऊँ बालक को मैं अपनी लाचारी
ले दूँ गर एकतार तो गुब्बारे कैसे लूंगी
अपने लाल को गरमा गरम पकौड़ी कैसे दूँगी
झूले पर बैठेगा कैसे मेरा राजकुमार
खेल खिलौनों से कैसे खेलेगा यह सुकुमार
देख विवश मुख माँ का बालक थोड़ा सा सकुचाया
क्या है बात बता ना तूने पहले क्यूँ बताया
एकतारे वाले तेरा यह बाजा मिट्टी का है
जाएगा यह फूट और फिर बज पायेगा क्या मुझसे
नहीं बजेगा मुझ से माँ चल यों ही देर करना
मेला बहुत बड़ा है वापस घर भी तो है चलना
चलो लाल भर आह कहा था माँ की आँख में पानी
नन्हा सा यह बालक फिर भी ज़रा नहीं नादानी..

Monday, 29 September 2008

तुम्हारे लिए


ये गूंगे पेड़पौधे


चाहते हैं तुम्हारा स्पर्श

रास नहीं आती है इन्हें

नए हाथों से परवरिश

देखते हैं उदास आखों से

ज्यों ढूँढती हो गाय

अपने प्रिय ग्वाले को

पत्ते पत्ते से झरती उदासी

चाहती है जानना

तुम्हारे न होने का सबब

कह दो ये भी देखें तुम्हें

दसों दिशाओं में, जैसे मैं

तुम्हारी सिरजी बेलें

बरजती हैं पास आने से

हो सके तो समझा दो उन्हें

तुम्हारा अक्स ढूंढें मुझमें

क्योंकि अब तुम बाहर नहीं

मेरे भीतर हो

मेरे हाथों में ताक़त तुम्हारी

मेरी गति में शक्ति तुम्हारी

मेरे जीवन में संकल्प

तुमसे है

मैं तुमसे एकमेक हूँ

जैसे बांसुरी और राग

जैसे चाँदनी और उजास

जैसे बादल और बिजली

जैसे जल और मछली

जैसे पानी और प्यास

जैसे राधा और रास

जैसे जीवन और सांस