Monday, 29 September 2008

तुम्हारे लिए


ये गूंगे पेड़पौधे


चाहते हैं तुम्हारा स्पर्श

रास नहीं आती है इन्हें

नए हाथों से परवरिश

देखते हैं उदास आखों से

ज्यों ढूँढती हो गाय

अपने प्रिय ग्वाले को

पत्ते पत्ते से झरती उदासी

चाहती है जानना

तुम्हारे न होने का सबब

कह दो ये भी देखें तुम्हें

दसों दिशाओं में, जैसे मैं

तुम्हारी सिरजी बेलें

बरजती हैं पास आने से

हो सके तो समझा दो उन्हें

तुम्हारा अक्स ढूंढें मुझमें

क्योंकि अब तुम बाहर नहीं

मेरे भीतर हो

मेरे हाथों में ताक़त तुम्हारी

मेरी गति में शक्ति तुम्हारी

मेरे जीवन में संकल्प

तुमसे है

मैं तुमसे एकमेक हूँ

जैसे बांसुरी और राग

जैसे चाँदनी और उजास

जैसे बादल और बिजली

जैसे जल और मछली

जैसे पानी और प्यास

जैसे राधा और रास

जैसे जीवन और सांस

15 comments:

विजय गौड़ said...

शुभ कामनाऎं। जारी रखियेगा।

Udan Tashtari said...

हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है. नियमित लेखन के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाऐं.

वर्ड वेरिपिकेशन हटा लें तो टिप्पणी करने में सुविधा होगी. बस एक निवेदन है.


डेश बोर्ड से सेटिंग में जायें फिर सेटिंग से कमेंट में और सबसे नीचे- शो वर्ड वेरीफिकेशन में ’नहीं’ चुन लें, बस!!!

Unknown said...

Amazing hai maaaa..
as usual...

आत्महंता आस्था said...

अच्छी कविता है, इसमें वह अनुभूति व्याप्त है जो एक कवि का हृदय ही प्राप्त कर सकता है.

mehek said...

bahut hi sundar kavita,badhai

रंजन राजन said...

पत्ते पत्ते से झरती उदासी
चाहती है जानना
तुम्हारे न होने का सबब
......हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.

Anonymous said...

हो सके तो समझा दो उन्हें

तुम्हारा अक्स ढूंढें मुझमें

क्योंकि अब तुम बाहर नहीं

मेरे भीतर हो


bahut hi sundar rachana,

vishal

Shastri JC Philip said...

स्पर्श जीवन की एक बहुत बडी सच्चाई है!!

हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.

मेरी कामना है कि यह नया कदम जो आपने उठाया है वह एक बहुत दीर्घ, सफल, एवं आसमान को छूने वाली यात्रा निकले. यह भी मेरी कामना है कि आपके चिट्ठे द्वारा बहुत लोगों को प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मिल सके.

हिन्दी चिट्ठाजगत एक स्नेही परिवार है एवं आपको चिट्ठाकारी में किसी भी तरह की मदद की जरूरत पडे तो बहुत से लोग आपकी मदद के लिये तत्पर मिलेंगे.

शुभाशिष !

-- शास्त्री (www.Sarathi.info)

Shastri JC Philip said...

एक अनुरोध -- कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन का झंझट हटा दें. इससे आप जितना सोचते हैं उतना फायदा नहीं होता है, बल्कि समर्पित पाठकों/टिप्पणीकारों को अनावश्यक परेशानी होती है. हिन्दी के वरिष्ठ चिट्ठाकारों में कोई भी वर्ड वेरिफिकेशन का प्रयोग नहीं करता है, जो इस बात का सूचक है कि यह एक जरूरी बात नहीं है.

वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिये निम्न कार्य करें: ब्लागस्पाट के अंदर जाकर --

Dahboard --> Setting --> Comments -->Show word verification for comments?

Select "No" and save!!

बस हो गया काम !!

श्यामल सुमन said...

विद्या जी,

भावनाओं को व्यक्त करने की एक अच्छी कोशिश। शुभकामनाएँ।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

कह दो ये भी देखें तुम्हें

दसों दिशाओं में, जैसे मैं


सुन्दर, अर्थपूर्ण कविता।
आपका स्वागत है, हिन्दी ब्लॉगजगत में।

36solutions said...

स्‍वागत .............

प्रदीप मानोरिया said...

जैसे बांसुरी और राग

जैसे चाँदनी और उजास

जैसे बादल और बिजली

जैसे जल और मछली

जैसे पानी और प्यास

जैसे राधा और रास

जैसे जीवन और सांस
सुंदर अति सुंदर पंक्तियाँ .. आपका चिठ्ठा जगत में हार्दिक स्वागत है निरंतरता की चाहत है .. मेरा आमंत्रण स्वीकारें समय निकल कर मेरे ब्लॉग पर पधारें

अभिषेक मिश्र said...

Tathakathit samyik kavitaon ke blogs ki bhir se alag. Apni alag pehchan banaye rakhein. Swagat.

बवाल said...

बहुत बेहतर ! बहुत अच्छी पोस्ट ! बधाई ! जारी रखिये !