Monday, 29 September 2008

तुम्हारे लिए


ये गूंगे पेड़पौधे


चाहते हैं तुम्हारा स्पर्श

रास नहीं आती है इन्हें

नए हाथों से परवरिश

देखते हैं उदास आखों से

ज्यों ढूँढती हो गाय

अपने प्रिय ग्वाले को

पत्ते पत्ते से झरती उदासी

चाहती है जानना

तुम्हारे न होने का सबब

कह दो ये भी देखें तुम्हें

दसों दिशाओं में, जैसे मैं

तुम्हारी सिरजी बेलें

बरजती हैं पास आने से

हो सके तो समझा दो उन्हें

तुम्हारा अक्स ढूंढें मुझमें

क्योंकि अब तुम बाहर नहीं

मेरे भीतर हो

मेरे हाथों में ताक़त तुम्हारी

मेरी गति में शक्ति तुम्हारी

मेरे जीवन में संकल्प

तुमसे है

मैं तुमसे एकमेक हूँ

जैसे बांसुरी और राग

जैसे चाँदनी और उजास

जैसे बादल और बिजली

जैसे जल और मछली

जैसे पानी और प्यास

जैसे राधा और रास

जैसे जीवन और सांस