Saturday, 4 October 2008

मेला

माँ का थामे हाथ बच्चा मेले में जो आया
सबसे पहले देख पकौड़ी मन उसका ललचाया
खींचा माँ ने हाथ अभी तो मेले में आए हो
देखो पहले क्या - क्या मेले में है अकुलाये हो
कूद कूद कर बच्चा चलता पकड़े माँ का हाथ
छोड़ देना हाथ नहीं तो खो जाएगा साथ
देख गुब्बारे बच्चा लपका माँ यह गुब्बारे ले दो
बचा सकोगे तुम इसको इसकी गारंटी दे दो
बच्चा सकुचाया अम्मा है भीड़ यहाँ पर भारी
अच्छा छोड़ो ले देना तुम जब आऊंगा अगली बारी
देखी उसने एक जगह पर फिरकी प्यारी प्यारी
अम्मा तुम यह फिरकी ले दो, है यह कितनी प्यारी
तभी देख झूले में बैठे रंग - बिरंगी पोशाकों में
सजे सजाये सुकुमारों को प्यारे प्यारे परिधानों में
अम्मा फिरकी फ़िर ले लेंगे जब आयेंगे अगली बारी
झूले में बैठा दो बोला बोलों में भर कर लाचारी
चलो घूम लेते हैं मेला फ़िर सोचेंगे क्या करना है
क्या क्या मेले में है पहले यह भी तो मालूम करना है
देख एकतारा बच्चे का मन लट्टू हो आया
बजा रहा था धुन कोई बूढ़ा मोहक मनभाया
बोला बच्चा माँ से माँ मुझको बस यह बजा दे दो
और नहीं कुछ मांगूंगा इसका वादा मुझ से ले लो
घूम चुके हैं अब तो काफी माँ के मन में आई
बोलो कितने में दे दोगे यह एकतारा भाई
बहन आठ आने दे दो यह बालक खुश हो जाएगा
बस दो चार बचे हैं फ़िर तो जाने कब आएगा
एक रुपैया गाँठ में बांधे माँ की चिंता भारी
कैसे समझाऊँ बालक को मैं अपनी लाचारी
ले दूँ गर एकतार तो गुब्बारे कैसे लूंगी
अपने लाल को गरमा गरम पकौड़ी कैसे दूँगी
झूले पर बैठेगा कैसे मेरा राजकुमार
खेल खिलौनों से कैसे खेलेगा यह सुकुमार
देख विवश मुख माँ का बालक थोड़ा सा सकुचाया
क्या है बात बता ना तूने पहले क्यूँ बताया
एकतारे वाले तेरा यह बाजा मिट्टी का है
जाएगा यह फूट और फिर बज पायेगा क्या मुझसे
नहीं बजेगा मुझ से माँ चल यों ही देर करना
मेला बहुत बड़ा है वापस घर भी तो है चलना
चलो लाल भर आह कहा था माँ की आँख में पानी
नन्हा सा यह बालक फिर भी ज़रा नहीं नादानी..

6 comments:

Udan Tashtari said...

कितनी विवश और बेबस माँ..बहुत मार्मिक रचना!!

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत मार्मिक्। प्रेमचंद की कहानी 'ईद' की याद आ गई। बधाई।

Jhangora said...

nice :)

Tarun said...

Vidya, Bahut hi marmik rachna, bachhe kitne hi masoom aur bachpane se bhare kyon na ho lekin woh maa ki vivshta bahut jaldi pehchan jaate hain.

आत्महंता आस्था said...

Uf! aapki is kavita ki samvedana ne mere rongte khade kar diye. Shayad mere pas is sandarbh se judpane ki himmat nahi ya shabd nahi.

Unknown said...

bahut hi sundar kavita, aankhon ke aage mele ka sa drishya banta gaya. akhiri panktiyon ne aankhon mein aansu la diya.